Lyrics Out of Skin at 05:07 AM in the Morning

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This is not a poem at all so don’t treat it as one. A rather rhetoric or a satirical lyrical poetry it can be called. This was a fine attempt by me today morning at 4 AM when I was watching something extraordinarily awe-inspiring. I thought to let it be reflected in these lines. Better to read and subsequently translate it into a life of a common man dreaming about making it big for his life but yes !! There is a lot of commotion in his life and this mundane set of on goings make him stop from taking a giant leap from subversiveness to audaciousness. 

Someone sometime somewhere commented that Journey is the destination in itself which is a fallacy according to my philosophy. I am always sure that a man undergoing journey has to reach somewhere and it’s not destined to be eternal. I would welcome any interpretations because this as far as I am concerned very logical trend of demise of a dream until the man returns to the dust.

सूरज को सवेरा पसंद है 

वोह कभी तो आएगा 
शोक मना मत तू प्यारे 
वो सवेरा ज़रूर आएगा ||
 
राही मत घबराना, वैसे घबराना भी अच्छा होता है 
दूर मंजिल पर पहुँचने पर याद तुझे सब आएगा 
शोक मना मत तू प्यारे 
वो सवेरा ज़रूर आएगा ||
 
जैसे शिकारी शिकार करते करते जंगल में भटक गया हो जैसे 
राही तू भी मंजिल को रास्ता समझ के चलता जा 
सच तोह यही है कि तू कहीं न कहीं तो पहुंचेगा 
शक की बेड़ियाँ तोड़ के तू मचलता हुआ सवेरे को देख कर बोलेगा 
“क्या ये स्वप्न है कि सच्चाई का आलम ?” – जवाब नहीं तेरी मेहनत का 
जग सारा क्या इतिहास भी सदियों तक बोलेगा ||
 
बात न ज्ञान कि है और न सोच की, राही खुद को पह्च्चान्ने में वक़्त लगा 
तू हीरा हो या कोयला, यहाँ हर चीज़ की बोली लगती है 
जान के अनजान बनती इस दुनिया को अपने लहजे में अपना मूल्य बता 
ये बोलने में आसान लगता है, करना उतना ही मुश्किल है 
चाहे जो भी लगे इस शरीर का, रक्त बहा , पसीना बहा , अपने तन के हर भाग को सता ||
 
सनातन धर्मं है ये, हमेशा से था और हमेशा रहेगा
कि मेहनत ही आदमी का कर्म है उसका धर्मं है, इस बात को घांट बाँध ले 
फल की चिंता मत कर, कर्म को ही अपना यार मान ले 
जैसे चींटी अपने गिरने का एहसास अपने अगली कोशिश को सफल करने में लगाती है 
उसी तरह अपनी हार को गले लगा ले ||
 
हमेशा याद रहे ओ राही कि कभी अपनी जीत को अपने दिमाग से एवं
अपनी हार को अपने दिल से मत लगाना 
क्यूंकि इन दोनों चीज़ों का नशा बड़ा सुहाना होता है 
सुहानी बारिश का मज़ा एक धनवान के लिए कुछ और है और सड़क के आदमी के लिए और 
ये विडंबना प्रकृति की है, बड़ा अजीब खेल होता है ||
 
किस्मत पर रोयेगा तो किस्मत तुझपे रोएगी 
कि ए पगले ! किस्मत कि जुबां नहीं होती कि वोह बता सके कि वो भी बदली जा सकती है
रूप, रेखा, शास्त्र, ग्रहों के खेल से निकल जा, ये उनके लिए है जो ज़िन्दगी कि राहों में अवसर की तलाश में हैं
अवसर तेरे सामने है, देख ले पकड़ ले फिर हाथ कभी न छोड़ना
अगर कहीं भगवान् है तो मनुष्य की ये हालत देख वे थोड़े निराश से हैं ||
 
संगीत सी है ये ज़िन्दगी, राग है इसका महत्वपूर्ण हिस्सा 
इसे सीखते सीखते बीत जाती है जवानी, खत्म हुआ शुरू का किस्सा 
वक़्त नजदीक आ रहा है , अंत और निकट है तेरे 
पता है तुझे मेहनत किस भाग पे करनी है, आवाज़ गले से आती है सबके 
विधि का विधान बुलाये है तुझे – ओ प्राणी साथ हो जा मेरे ||
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